(एक)-पहाड़, (दो )-खेजड़ा - कैलाश मनहर
(एक)
पहाड़
आसमान झुक रहा था उनके क़दमों पर
जिन्होंने पहाड़ लाँघे
हरे-भरे मैदान बुला रहे थे उन्हें
बाँह पसारे
ईश्वर स्वयं उतर आया था उनकी आँखों में
जिन्होंने पहाड़ काटे
सिन्दूरी सूर्य के प्रकाश से थे वे
तेजोद्दीप्त और जागृत
उन्हीं की हो गई समूची पृथ्वी
जिन्होंने पहाड़ ढोये
हरेक पहाड़ के हृदय में था
करुणामय विलाप
जो भी पहाड़ों के सम्पर्क में रहा
उसने यही कहा
कि तभी तो है मनुष्य का होना
कि वह भूल न जाये पहाड़ ढोना
*कैलाश मनहर
(दो)
खेजड़ा
अनुकूल मौसम में पनपते हैं कीट
प्रतिकूलताओं में नष्ट हो जाते हैं
नहीं कहीं नहीं है जल
दृष्टि सीमा से भी दूर
हर ओर
पसरी हुई है रेत
कहीं भी नहीं है जल या जल की सम्भावना
इस मरुस्थल में
किन्तु पूरी दृढ़ता से खड़ा है
हरियल खेजड़ा
सूरज की ज्वाला को मुँह चिढ़ाता
बादलों को अंगूठा दिखाता हुआ
रेत के प्रेम-पाश में बँधा
मुस्कराता वह
आग में से जल निचोड़ने वाला पारखी
पूरी दृढ़ता से खड़ा है
जलविहीन मरुस्थल का जीवन
ऋषिवत्
समय तेरी चुनौती स्वीकार है हमें
दशाओं को कर सकता है तू अपने अधीन
किन्तु हम भी
खूब जानते हैं दिशाओं के द्वार खोलना.
*कैलाश मनहर
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