दादी माँ, स्त्री के बारे में - कैलाश मनहर
दादी माँ सीलन भरी कोठरी के अँधेरे कौने में कुछ चिथड़े बिखरे हैं लाल , पीले , काले , सफेद सादे और फूलोंदार घाघरे लूगड़ी और सूती धोतियाँ पेटीकोट कुछ अपने बिसाये कुछ पीहर से लाये कुछ हाथ के सींये कुछ बेटे बहुओं के दिये ऐरे की चौड़ी पत्तियों से बनी एक खरोली है जिसमें रखा है मोटे काँचो वाला टूटे फ्रेम का चश्मा और नियोस्प्रीन आई ओइन्टमेंट की पाँच ग्राम वाली पिचकी हुई ट्यूब जिन्हें कि अपनी दुनिया को देखते रहने की अदम्य लालसा के वशीभूत आँखों की सलामती के लिये संभाले रखती है दादी माँ दादी माँ सठियाने-सी लगी है पोतों और पतोहुओं की दृष्टि में कि ज़माना बदल रहा है और उसे अब भी पसंद है साइकिल के टायर की डसों वाली सस्ती और घटिया चप्पलें दादी माँ नहीं जानती कि घर में ही चला लेती हैं अब बेटियाँ और बहुयें सिलाई मशीन और छाती ढंकने के ब्लाउज़ बन जाते हैं सिर्फ़ पैंसठ सेंटीमीटर कपड़े में दादी माँ ने अब तक धर रखी है छींके से लटकती कोथळी में धागे की अँटी और गूदड़े सींने वाली बड...










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